सदगुरुदेव
साथी-सगे सब स्वार्थ के हैं, स्वार्थ का संसार है |
निःस्वार्थ सदगुरुदेव हैं, सच्चा वही हितकार है ||
ईश्वरकृपा होवे तभी, सदगुरुकृपा जब होये है |
सदगुरु कृपा बिनु ईश भी, नहीं मैल मन का धोय है ||
निर्जीव सारे शास्त्र सच्चा मार्ग ही दिखलाय है |
दृढ़ ग्रन्थि की जड़ खोलने कि युक्ति नहीं बतलाय है ||
निस्संग होने के सबब से ईश भी रुक जाय है |
गुरु गाँठ खोलन रीति तो, गुरुदेव ही बतलाय हैं ||
गुरुदेव अदभुत रूप हैं, परधाम माहीं विराजते |
उपदेश देने सत्य का, इस लोक में आ जावते ||
दुर्गम्य का अनुभव करा, भय से परे ले जावते |
परधाम में पहुँचाय कर, स्वराज्यपद दिलवावते ||
छुड़वाय कर सब कामना, कर देय हैं निष्कामना |
सब कामनाओं का बता घर, पूर्ण करते कामना ||
मिथ्या विषयसुख से हटा, सुखसिंधु देते हैं बता |
सुखसिंधु जल से पूर्ण अपना, आप देते हैं जता ||
तन इन्द्रियाँ मन बुद्धि सब, संबंध छुड़वा देय हैं |
अणु ग्रहण करत सूर्य ज्युँ, जग माहीं चमका देय है ||
आधार सारे विश्व का, सबका ही जो अध्यक्ष है |
सो ही बनाते जीव को, ब्रह्माण्ड जिसका साक्ष है ||
इक तुच्छ वस्तु छीनकर, आपत्तियाँ सब मेट कर |
प्याला पिला कर अमृत का, मर को बनाते हैं अमर ||
सब भाँति से कृत कृत्य कर, परतंत्र को निज तंत्र कर |
अधिपति रहित देते बना, भय से छुड़ा करते निड़र ||
कंचन बनाते देह को, रज मैल सब हर लेय हैं |
ले कांच कच्चा हाथ से, कौश्टब मणि दे देय हैं ||
इस लोक से परलोक से, सब कर्म से सब धर्म से |
परतत्त्व में पहुँचाय कर, ऊँचा करे हैं सर्व से ||
सदगुरु जिसे मिल जाये सो ही, धन्य है जग मन्य है ||
सुर सिद्ध उसको पूजते, ता सम न कोऊ अन्य है ||
अधिकारी हो गुरुदेव से, उपदेश जो नर पाय है |
भोला! तरे संसार से, नहीं गर्भ में फ़िर आय है ||
ईश्वर कृपा से, गुरु कृपा से, मर्म मैंने पा लिया |
ज्ञानाग्नि में अज्ञान कूड़ा, भस्म सब है कर दिया ||
अब हो गया है स्वस्थ सम्यक, लेष नहीं भ्रांत है |
शंका हुइ निर्मूल सब, अब चित्त मेरा शांत है ||
-- भोले बाबा
Sunday, September 20, 2009
ज़रा ठहरो गुरुदेवा, अभी दिल भरा ही नहीं
ज़रा ठहरो गुरुदेवा, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं |
करें दर्शन, तुम्हारा हम, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||१||
ये मतलब की है सब दुनिया हमें भरमायेगी, हमें भरमायेगी |
तेरी रहमत हमको गुरुवर, खुद ही तरायेगी, खुद ही तरायेगी |
यूँ हमसे दूर ना जाओ, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||२||
एक झलक तेरी मेरे गुरुवर, बिगड़ी बनायेगी, बिगड़ी बनायेगी |
तेरी कृपा, सब प्यासों की, प्यास बुझायेगी, प्यास बुझायेगी |
ज़रा हम पर नजर ड़ालो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||३||
तुम जाओगे तो ये आँखें नीर बहायेंगी, नीर बहायेंगी |
मेरे जीवन में गुरुवर, उदासी छायेगी, उदासी छायेगी |
रहम की अब, नजर ड़ालो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||४||
तेरी कृपा ही हम को, तुम से मिलायेगी, तुम से मिलायेगी |
तेरी सेवा मेरा जीवन सफ़ल बनायेगी, सफ़ल बनायेगी |
ज़रा अमृत तो बरसाओ, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||५||
तेरी करुणा ही भक्ति की, लगन लगायेगी, लगन लगायेगी |
तेरी दृष्टि मन मंदिर, में ज्योत जलायेगी, ज्योत जलायेगी |
तेरी मुस्कान से गुरुवर, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||६||
पीड़ा विरह की हमको प्रभु, खूब सतायेगी, खूब सतायेगी |
बिना तेरे हृदय की कलियाँ, ये मुरझायेगी, ये मुरझायेगी |
विनय स्वीकार तुम कर लो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||७||
ज़रा ठहरो गुरुदेवा, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं |
करें दर्शन, तुम्हारा हम, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||
करें दर्शन, तुम्हारा हम, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||१||
ये मतलब की है सब दुनिया हमें भरमायेगी, हमें भरमायेगी |
तेरी रहमत हमको गुरुवर, खुद ही तरायेगी, खुद ही तरायेगी |
यूँ हमसे दूर ना जाओ, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||२||
एक झलक तेरी मेरे गुरुवर, बिगड़ी बनायेगी, बिगड़ी बनायेगी |
तेरी कृपा, सब प्यासों की, प्यास बुझायेगी, प्यास बुझायेगी |
ज़रा हम पर नजर ड़ालो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||३||
तुम जाओगे तो ये आँखें नीर बहायेंगी, नीर बहायेंगी |
मेरे जीवन में गुरुवर, उदासी छायेगी, उदासी छायेगी |
रहम की अब, नजर ड़ालो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||४||
तेरी कृपा ही हम को, तुम से मिलायेगी, तुम से मिलायेगी |
तेरी सेवा मेरा जीवन सफ़ल बनायेगी, सफ़ल बनायेगी |
ज़रा अमृत तो बरसाओ, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||५||
तेरी करुणा ही भक्ति की, लगन लगायेगी, लगन लगायेगी |
तेरी दृष्टि मन मंदिर, में ज्योत जलायेगी, ज्योत जलायेगी |
तेरी मुस्कान से गुरुवर, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||६||
पीड़ा विरह की हमको प्रभु, खूब सतायेगी, खूब सतायेगी |
बिना तेरे हृदय की कलियाँ, ये मुरझायेगी, ये मुरझायेगी |
विनय स्वीकार तुम कर लो, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||७||
ज़रा ठहरो गुरुदेवा, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं |
करें दर्शन, तुम्हारा हम, अभी दिल भरा ही नहीं, अभी दिल भरा ही नहीं ||
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें
बार बार मिलने को मन ललचाये..
बार बार तुम ने दिखाया सच का चेहरा
आप का ही ज्ञान प्रभु सब से गहरा
आप के चरणों में दिल है ठहरा
आप से ही लगता है हरपल सुनहरा
आप के ही चरणों में मस्तक झुकायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुम ही हो गुरुवर जीवन हमारा
सम्भव नहीं अब तो तुम बिन गुजारा
छूटेगा कभी अब ना दामन तुम्हारा
जैसे भी हैं तेरे हैं देना तुम सहारा
आप की छवि ही हृदय में बसाये
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुम बिन ये जीवन का सूना विराना
श्रद्धा भक्ति के सुख से था बेगाना
तुम्हें पाके लगता है प्यारा सुहाना
आप का रिश्ता लगे सदियों पुराना
आप की याद में हर दिन बितायें
आप से कभी हम दूर न जायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें
इतनी ही रहमत प्रभु हम पे करना
दिल ये हमारा तुम श्रद्धा से भरना
आप के सुमिरन में जीना मरना
आप ही हमारे दोष दुर्गुण हरना
आप में ही हम अपनी लगन ये लगायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुमसे ही छू कर के आती हैं हवायें
महकते तन मन ये, महकती फिज़ायें
तुमसे ही खुशियों के दीप जगमगायें
ज्ञान से हृदय के कमल हैं खिलाये
आप के ही चरणो में मस्तक झुकायें
आप की ही यादों में हर पल बितायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
बार बार मिलने को मन ललचाये..
बार बार तुम ने दिखाया सच का चेहरा
आप का ही ज्ञान प्रभु सब से गहरा
आप के चरणों में दिल है ठहरा
आप से ही लगता है हरपल सुनहरा
आप के ही चरणों में मस्तक झुकायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुम ही हो गुरुवर जीवन हमारा
सम्भव नहीं अब तो तुम बिन गुजारा
छूटेगा कभी अब ना दामन तुम्हारा
जैसे भी हैं तेरे हैं देना तुम सहारा
आप की छवि ही हृदय में बसाये
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुम बिन ये जीवन का सूना विराना
श्रद्धा भक्ति के सुख से था बेगाना
तुम्हें पाके लगता है प्यारा सुहाना
आप का रिश्ता लगे सदियों पुराना
आप की याद में हर दिन बितायें
आप से कभी हम दूर न जायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें
इतनी ही रहमत प्रभु हम पे करना
दिल ये हमारा तुम श्रद्धा से भरना
आप के सुमिरन में जीना मरना
आप ही हमारे दोष दुर्गुण हरना
आप में ही हम अपनी लगन ये लगायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
तुमसे ही छू कर के आती हैं हवायें
महकते तन मन ये, महकती फिज़ायें
तुमसे ही खुशियों के दीप जगमगायें
ज्ञान से हृदय के कमल हैं खिलाये
आप के ही चरणो में मस्तक झुकायें
आप की ही यादों में हर पल बितायें
ऐसा तेरा प्यार गुरुवर भूल न पायें..
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
गंगा सा पावन दिल को बनाते
मेरी भी विनती सुनो गुरुदेवा
चरणों में रखना मेरे गुरुदेवा
भक्ति बढ़ाओ गुरुदेव
मेरी प्रीति बढ़ाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
१) तुम साथ हो तो डर हमको कैसा
तुम जो कहो अब करें हम तो वैसा
अपना बनाओ गुरुदेव
दिल में बस जाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
२) तीरथ वहीं जहाँ तेरे कदम हैं
तुम हो हमारे ये कृपा क्या कम है
सपनों में आओ गुरुदेव
दरस दिखाओ गुरुदेव
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
३) हम तो थे नश्वर की प्राप्ति में फूले
छूटेगा सबकुछ हम ये तो थे भूले
सत्य बताओ गुरुदेव
मेरी भ्रांति मिटाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
४) नाम ये तेरा हमारी है ताकत
कट जाते दुख सारे टल जाए आफत
ध्यान में डुबाओ गुरुदेव
अनहद सुनाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
५) किसमें भला है पता ना है हमको
सौंप दी है डोरी अब हमने ये तुमको
हमको बचाओ गुरुदेव
पार लगाओ गुरुदेव
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
गंगा सा पावन दिल को बनाते
गंगा सा पावन दिल को बनाते
मेरी भी विनती सुनो गुरुदेवा
चरणों में रखना मेरे गुरुदेवा
भक्ति बढ़ाओ गुरुदेव
मेरी प्रीति बढ़ाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
१) तुम साथ हो तो डर हमको कैसा
तुम जो कहो अब करें हम तो वैसा
अपना बनाओ गुरुदेव
दिल में बस जाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
२) तीरथ वहीं जहाँ तेरे कदम हैं
तुम हो हमारे ये कृपा क्या कम है
सपनों में आओ गुरुदेव
दरस दिखाओ गुरुदेव
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
३) हम तो थे नश्वर की प्राप्ति में फूले
छूटेगा सबकुछ हम ये तो थे भूले
सत्य बताओ गुरुदेव
मेरी भ्रांति मिटाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
४) नाम ये तेरा हमारी है ताकत
कट जाते दुख सारे टल जाए आफत
ध्यान में डुबाओ गुरुदेव
अनहद सुनाओ गुरुदेव
गंगा सा पावन दिल को बनाते
५) किसमें भला है पता ना है हमको
सौंप दी है डोरी अब हमने ये तुमको
हमको बचाओ गुरुदेव
पार लगाओ गुरुदेव
भक्ति की धारा गुरुवर बहाते
गंगा सा पावन दिल को बनाते
Friday, September 18, 2009
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में |
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में |
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
निस दिन तेरा नाम पुकारें, निस दिन तेरी ज्योत जलावें |
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
ऐसी अंतर ज्योत जलवो, हम दीनों को पार लगा दो -२
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
जिसने बापू का नाम पुकारा, दूर हुआ उसका अंधियारा |
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में -२
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में -२ |
मेरे बापू के दरबार में, मेरे साईं के दरबार में ||
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
निस दिन तेरा नाम पुकारें, निस दिन तेरी ज्योत जलावें |
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
ऐसी अंतर ज्योत जलवो, हम दीनों को पार लगा दो -२
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में
जिसने बापू का नाम पुकारा, दूर हुआ उसका अंधियारा |
आओ रे भक्तों भक्ति कर लो बापू के दरबार में ||
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में -२
जगमग-जगमग ज्योत जले मेरे बापू के दरबार में -२ |
मेरे बापू के दरबार में, मेरे साईं के दरबार में ||
वह भक्त ही क्या जो तुमसे मिलने की दुआ न करे ?
वह भक्त ही क्या जो तुमसे मिलने की दुआ न करे ?
भूल प्रभु को जिंदा रहूँ कभी ये खुदा न करे ।
हे गुरुवर !
लगाया जो रंग भक्ति का, उसे छूटने न देना ।
गुरु तेरी याद का दामन, कभी छूटने न देना ॥
हर साँस में तुम और तुम्हारा नाम रहे ।
प्रीति की यह डोरी, कभी टूटने न देना ॥
श्रद्धा की यह डोरी, कभी टूटने न देना ।
बढ़ते रहे कदम सदा तेरे ही इशारे पर ॥
गुरुदेव ! तेरी कृपा का सहारा छूटने न देना।
सच्चे बनें और तरक्की करें हम,
नसीबा हमारी अब रूठने न देना।
देती है धोखा और भुलाती है दुनिया,
भक्ति को अब हमसे लुटने न देना ॥
प्रेम का यह रंग हमें रहे सदा याद,
दूर होकर तुमसे यह कभी घटने न देना।
बडी़ मुश्किल से भरकर रखी है करुणा तुम्हारी....
बडी़ मुश्किल से थामकर रखी है श्रद्धा-भक्ति तुम्हारी....
कृपा का यह पात्र कभी फूटने न देना ॥
लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।
प्रभुप्रीति की यह डोर कभी छूटने न देना ॥
भूल प्रभु को जिंदा रहूँ कभी ये खुदा न करे ।
हे गुरुवर !
लगाया जो रंग भक्ति का, उसे छूटने न देना ।
गुरु तेरी याद का दामन, कभी छूटने न देना ॥
हर साँस में तुम और तुम्हारा नाम रहे ।
प्रीति की यह डोरी, कभी टूटने न देना ॥
श्रद्धा की यह डोरी, कभी टूटने न देना ।
बढ़ते रहे कदम सदा तेरे ही इशारे पर ॥
गुरुदेव ! तेरी कृपा का सहारा छूटने न देना।
सच्चे बनें और तरक्की करें हम,
नसीबा हमारी अब रूठने न देना।
देती है धोखा और भुलाती है दुनिया,
भक्ति को अब हमसे लुटने न देना ॥
प्रेम का यह रंग हमें रहे सदा याद,
दूर होकर तुमसे यह कभी घटने न देना।
बडी़ मुश्किल से भरकर रखी है करुणा तुम्हारी....
बडी़ मुश्किल से थामकर रखी है श्रद्धा-भक्ति तुम्हारी....
कृपा का यह पात्र कभी फूटने न देना ॥
लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।
प्रभुप्रीति की यह डोर कभी छूटने न देना ॥
Wednesday, September 16, 2009
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सूरत नूरानी मन में बसी है
ऐसी छवि हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
मीरा और शबरी ने गुरु आज्ञा मानी
ज्ञानेश्वर जी ने भी गुरु महिमा जानी
ज्ञान बदते , मार्ग दिखाते .
रब की मूरत हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कितनों को तेरी भक्ति ने तारा
कितनों का तुमने जीवन सवारा
सांसो में बसते, धड़कन चलाते.
सृष्टि के कर्ता हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सच झूठे की हमको परख नहीं थी
राह सही थी न सोच सही थी
तुमने उबारा, हमको सवारा
सचे हितेषी तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
दूर हो तन से परख क्या पड़ता
द्रण निष्ठा से शिष्य आगे है बढता
सपनो में आते हो, अपना बनाते हो
हम सबके इश्वर हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
एकलव्य की थी निराली थी रीति
अद्भुत थी आरुणी, धुव की वो प्रीति
साची हो श्रद्दा , अटल भरोसा
हमको भी दे दो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कृपा के बदले में हम तुमको क्या दे हम
चरणों में खुद को ही अर्पण करे हम
ये उपकार करना, दिल में ही रहना
दूर न जाना तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
तुम बिन कोई न इच्छा रखे हम
जैसा भी चाहो वही करे हम
तुमको ही ध्याये, तुमको ही पाए
हम सबकी मंजिल तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सूरत नूरानी मन में बसी है
ऐसी छवि हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
मीरा और शबरी ने गुरु आज्ञा मानी
ज्ञानेश्वर जी ने भी गुरु महिमा जानी
ज्ञान बदते , मार्ग दिखाते .
रब की मूरत हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कितनों को तेरी भक्ति ने तारा
कितनों का तुमने जीवन सवारा
सांसो में बसते, धड़कन चलाते.
सृष्टि के कर्ता हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
सच झूठे की हमको परख नहीं थी
राह सही थी न सोच सही थी
तुमने उबारा, हमको सवारा
सचे हितेषी तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
दूर हो तन से परख क्या पड़ता
द्रण निष्ठा से शिष्य आगे है बढता
सपनो में आते हो, अपना बनाते हो
हम सबके इश्वर हो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
एकलव्य की थी निराली थी रीति
अद्भुत थी आरुणी, धुव की वो प्रीति
साची हो श्रद्दा , अटल भरोसा
हमको भी दे दो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
कृपा के बदले में हम तुमको क्या दे हम
चरणों में खुद को ही अर्पण करे हम
ये उपकार करना, दिल में ही रहना
दूर न जाना तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम.
तुम बिन कोई न इच्छा रखे हम
जैसा भी चाहो वही करे हम
तुमको ही ध्याये, तुमको ही पाए
हम सबकी मंजिल तो तुम
आये हो जगत में हमारे लिए गुरु तुम
Tuesday, September 15, 2009
पछताओगे गुरुदर छोड़ के गर तुम जाओगे
पछताओगे गुरुदर छोड़ के गर तुम जाओगे
हर करनी का सम्यक रहते फल तुम पाओगे!
गुरु की जिसने बात न मानी उसको होती भारी हानि
होता है वो किस्मत वाला जिसने गुरु की महिमा जानी,
गुरु से उच्चा कोई न होवे
पछताओगे गुरुदर..........
हमने हीरा जन्म ये पाया जिसने दिया उसको ही भूलाया
पायी न वो आत्म शान्ति उलझे सब पाने को माया
सब कुछ पाके भी क्यूँ तू सोये
पछताओगे गुरुदर.........
मोती खोके पाए कंकर क्यूँ करता भूले तू भयंकर
तू जन्मा है रजा होकर रहता है क्यूँ रंक तू होकर
क्यूँ खुद ही कांटे तू बोए
पछताओगे गुरुदर.........
गुरु ज्ञान में मार ले गोटा क्यूँ ऐसा अवसर है खोता
करले मानव गुरु की भक्ति गुरु बिना कोई पार न होता
गुरु ही मन का मैल है धोये
पछताओगे गुरुदर.....
बिचडे हैं उस प्यारे से हम तभी मिले हमको हैं ये गम
उनकी करते गुरुवार रक्षा श्रद्धा जिनकी न हो कभी कम
सुबह हुई अब क्यूँ तू सोए
पछताओगे गुरुदर......
साथ न तेरा देंगे कोई चाहे ब्रह्म शंकर हुई
तांडव करेगी मृतु सर पर रक्षक न तेरे होवे कोई
आखिर में तू क्यूँ है सोए
पछताओगे गुरुदर......
हर करनी का सम्यक रहते फल तुम पाओगे!
गुरु की जिसने बात न मानी उसको होती भारी हानि
होता है वो किस्मत वाला जिसने गुरु की महिमा जानी,
गुरु से उच्चा कोई न होवे
पछताओगे गुरुदर..........
हमने हीरा जन्म ये पाया जिसने दिया उसको ही भूलाया
पायी न वो आत्म शान्ति उलझे सब पाने को माया
सब कुछ पाके भी क्यूँ तू सोये
पछताओगे गुरुदर.........
मोती खोके पाए कंकर क्यूँ करता भूले तू भयंकर
तू जन्मा है रजा होकर रहता है क्यूँ रंक तू होकर
क्यूँ खुद ही कांटे तू बोए
पछताओगे गुरुदर.........
गुरु ज्ञान में मार ले गोटा क्यूँ ऐसा अवसर है खोता
करले मानव गुरु की भक्ति गुरु बिना कोई पार न होता
गुरु ही मन का मैल है धोये
पछताओगे गुरुदर.....
बिचडे हैं उस प्यारे से हम तभी मिले हमको हैं ये गम
उनकी करते गुरुवार रक्षा श्रद्धा जिनकी न हो कभी कम
सुबह हुई अब क्यूँ तू सोए
पछताओगे गुरुदर......
साथ न तेरा देंगे कोई चाहे ब्रह्म शंकर हुई
तांडव करेगी मृतु सर पर रक्षक न तेरे होवे कोई
आखिर में तू क्यूँ है सोए
पछताओगे गुरुदर......
यह प्रेम पंथ येसा ही है जिसमे कोई चल न सके
यह प्रेम पंथ येसा ही है जिसमे कोई चल न सके
कितने ही बड़े बड़े फिसले, कुछ आगे गए और संभल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
जो कुछ न चाहते है जग में , वह कही न रुकते है मग में,
है सुन्दर साची प्रीति वही , जो उर से कभी निकल न सके.
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वे प्रेमी ही अधिकारी है , जो इतने धिरजधारी है
चाहे कितना दुःख आये , तन जाये पर प्रण टल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वे मिलते सब कुछ खोने से , उनका मल धुलता रोने से
प्रियतम का वह प्रेमी कैसा , जो विरह अग्नि में जल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
कितने ही बड़े बड़े फिसले, कुछ आगे गए और संभल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
जो कुछ न चाहते है जग में , वह कही न रुकते है मग में,
है सुन्दर साची प्रीति वही , जो उर से कभी निकल न सके.
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वे प्रेमी ही अधिकारी है , जो इतने धिरजधारी है
चाहे कितना दुःख आये , तन जाये पर प्रण टल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वे मिलते सब कुछ खोने से , उनका मल धुलता रोने से
प्रियतम का वह प्रेमी कैसा , जो विरह अग्नि में जल न सके
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
साधको की ये हरि ओम बोली
साधको की ये हरि ओम बोली l
ऐसी वैसी ये बोली नही है ll
निन्दको की तड़क और गरज से l
डर ने वाली ये टोली नही है ll
लेकर सत्संग हरि ओम साधक l
सत्य संदेश दिल मे है धारे ll
सुन लो जग वालो इन अफावाओ से l
डरनेवाली ये टोली नही है ll
जो भी सुन ले उसी को है
मानेदुनिया इतनी भी भोली नही है..ll
ब्र्म्हवेत्ता की लेता है परीक्षा l
श्रध्दा किसीकी भी डोली नही है ll
हम तो सदगुर के प्यारे है साधक l
जैसे सिंह के दुलारे ही श्रावक ll
भूल कर भी इन्हें न सताना l
गिधडो की ये टोली नही है ll
थक गए सब जग वाले निंदक l
साधको की ना श्रध्दा घटी है ll
हम तो प्यारे है अपने बापू के l
ऐसे वैसे हमजोली नही है ll
विश्व पद पे भारत रहेगा l
प्यारे बापू की बोली यही है ll
साधको का संकल्प है पुरा l
कायरो कि ये बोली नही है ll
दुर्मति से भरे है जो निंदक l
नरक गामी फिर उनकी गति है ll
खैरियत समझो जब तक बापू ने l
तीसरी आँख खोली नही है ll साधको की ये हरि ओम बोली l
ऐसी वैसी ये बोली नही है ll
निन्दको की तड़क और गरज से l
डर ने वाली ये टोली नही है ll
ऐसी वैसी ये बोली नही है ll
निन्दको की तड़क और गरज से l
डर ने वाली ये टोली नही है ll
लेकर सत्संग हरि ओम साधक l
सत्य संदेश दिल मे है धारे ll
सुन लो जग वालो इन अफावाओ से l
डरनेवाली ये टोली नही है ll
जो भी सुन ले उसी को है
मानेदुनिया इतनी भी भोली नही है..ll
ब्र्म्हवेत्ता की लेता है परीक्षा l
श्रध्दा किसीकी भी डोली नही है ll
हम तो सदगुर के प्यारे है साधक l
जैसे सिंह के दुलारे ही श्रावक ll
भूल कर भी इन्हें न सताना l
गिधडो की ये टोली नही है ll
थक गए सब जग वाले निंदक l
साधको की ना श्रध्दा घटी है ll
हम तो प्यारे है अपने बापू के l
ऐसे वैसे हमजोली नही है ll
विश्व पद पे भारत रहेगा l
प्यारे बापू की बोली यही है ll
साधको का संकल्प है पुरा l
कायरो कि ये बोली नही है ll
दुर्मति से भरे है जो निंदक l
नरक गामी फिर उनकी गति है ll
खैरियत समझो जब तक बापू ने l
तीसरी आँख खोली नही है ll साधको की ये हरि ओम बोली l
ऐसी वैसी ये बोली नही है ll
निन्दको की तड़क और गरज से l
डर ने वाली ये टोली नही है ll
Saturday, September 5, 2009
श्री आसारामायण
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गुरु चरण रज शीश धरी , हृदय रूप विचार ।
श्री आसारामायण कहों , वेदान्त को सार ॥
धर्म कामार्थ मोक्ष दे , रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से , शीघ्र हो बेडा पार ॥
भारत सिंधु नदी बखानी , नवाब जिले में गाँव बेराणी
रहता एक सेठ गुनखानी , नाम थाउमल सिरुमलानी
आज्ञा में रहती मेंह्गीबा , पति परायण नाम मंगीबा
चैत वद छः उन्नीस अठानवे , आसुमल अवतरित आँगने
माँ मन में उमडा सुख सागर , द्वार पे आया एक सौदागर
लाया एक अति सुन्दर झूला , देख पिता मन हर्ष से फूला
सभी चकित ईश्वर की माया , उचित समय पर कैसे आया
ईश्वर की यह लीला भारी , बालक है कोई चमत्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
संत सेवा और श्रुति श्रवण , मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई , पुण्यों का फल भारी ॥
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी
समाज में थी मान्यता जैसी , प्रचलित एक कहावत ऐसी
तीन बहन के बाद जो , आता पुत्र वह त्रेखन कहलाता
होता अशुभ अमंगल कारी , दरिद्रता लाता है भारी
विपरीत किन्तु दिया दिखाई , घर में जैसे लक्ष्मी आई
तिरलोकी का आसन डोला , कुबेर ने भण्डार ही खोला
मान प्रतिष्ठा और बढाई , सब के मन सुख शांति छाई
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
तेजोमय बालक बढा , आनंद बढा अपार ।
शील शांति का आत्मधन , करने लगा विस्तार ॥
एक दिना थाउमल द्वारे , कुलगुरु परशुराम पधारे
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे , अनायास ही सहसा पुकारे
यह नहीं बालक साधारण , दैवी लक्षण तेज हैं कारण
नेत्रों में है सात्विक लक्षण , इसके कार्य बडे विलक्षण
यह तो महान संत बनेगा , लोगों का उद्धार करेगा
सुनी गुरु की भविष्य वाणी , गद गद हो गए सिरुमलानी
माता ने भी माथा चूमा , हर कोई ले करके घूमा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ज्ञानी वैरागी पूर्व का , तेरे घर में आये ।
जन्म लिया है योगी ने , पुत्र तेरा कहलाये ॥
पावन तेरा कुल हुआ , जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ , पूर्ण चार पुरुषार्थ ॥
सैतालिस में देश विभाजन , पाक में छोडा भू पशु औ धन
भारत अमदाबाद में आये , मणिनगर में शिक्षा पाए
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति , असुमल की आशु युक्ति
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता , त्वरित कार्य और सहनशीलता
आसुमल प्रसन्न मुख रहते , शिक्षक हसमुख भाई कहते
पिस्ता बादाम काजू अखरोट , भरे जेब खाते भर पेटा
दे दे मक्खन मिश्री कूजा , माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे , रहे न मछली जल बिन जैसे
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे , वही है विद्या या विमुक्तये
बहुत रात तक पैर दबाते , भरे कंठ पितु आशीष पाते
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पुत्र तुम्हारा जगत में , सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा , पूरन होंगे काम ॥
सिर से हटी पिता की छाया , तब माया ने जाल फैलाया
बडे भाई का हुआ दुसाशन , व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा , शुरू हो गई अग्नि परीक्षा
गए सिद्धपुर नौकरी करने , कृष्ण के आगे बहाए झरने
सेवक सखा भाव से भीजे , गोविन्द माधव तब रीझे
एक दिना एक माई आई , बोली हे भगवन सुखदायी
पड़े पुत्र दुख मुझे झेलने , खून केस दो बेटे जेल में
बोले आसु सुख पावेंगे , निर्दोष छुट जल्दी आवेंगे
बेटे घर आये माँ भागी , आसुमल के पावों लगी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसुमल का पुष्ट हुआ , आलोकिक प्रभाव ।
वाक सिद्धि की शक्ति का , हो गया प्रादुर्भाव ॥
बरस सिद्धपुर तीन बिताये , लौट अहमदाबाद में आये
करने लगी लक्ष्मी नर्तन , किया भाई का दिल परिवर्तन
दरिद्रता को दूर कर दिया , घर वैभव भरपूर कर दिया
सिनेमा उन्हें कभी न भाये , बलात ले गए रोते आये
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया , उसको ही अब रोना आया
माँ करना चाहती थी शादी , आसुमल का मन वैरागी
फिर भी सबने शक्ति लगाई , जबरन कर दी उनकी सगाई
शादी को जब हुआ उनका मन , आसुमल कर गए पलायन
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पंडित कहा गुरु समर्थ को , रामदास सावधान ।
शादी फेरे फिरते हुए , भागे छुडा कर जान ॥
करत खोज में निकल गया दम , मिले भरुच में अशोक आश्रम
कठिनाई से मिला रास्ता , प्रतिष्ठा का दिया वास्ता
घर में लाये आजमाये गुर , बारात ले पहुंचे आदिपुर
विवाह हुआ पर मन द्रढाया , भगत ने पत्नी को समझाया
अपना व्यवहार होगा ऐसे , जल में कमल रहता है जैसे
सांसारिक व्यवहार तब होगा , जब मुझे साक्षात्कार होगा
साथ रहे ज्यूँ आत्मा काया , साथ रहे वैरागी माया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
अनश्वर हूँ मैं जानता , सत-चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ , होवे परमानन्द ॥
मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु , संस्कृत भाषा है एक सेतु
संस्कृत की शिक्षा पायी , गति और साधना बढाई
एक श्ळोक ह्रदय में पैठा , वैराग्य सोया उठ बैठा
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित , उनकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित
लक्ष्मी देवी को समझाया , ईश प्राप्ति ध्येय बताया
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा , लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा
केदारनाथ के दर्शन पाए , लक्षाधिपति आशीष पाए
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये , ईश प्राप्ति आशीष पाए
आये कृष्ण लीला स्थली में , वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला , वे जा पहुंचे नैनिताला
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित , स्वामी लीलाशाह प्रतिष्टित
भीतर तरल थे बाहर कठोरा , निर्विकल्प ज्यूँ कागज़ कोरा
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी , ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ईश-कृपा बिन गुरु नहीं गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहि वेद-पुराण ॥
जानने को साधक की कोटी , सत्तर दिन तक हुई कसौटी
कंचन को अग्नि में तपाया , गुरु ने आसुमल बुलवाया
कहा गृहस्थ हो कर्म करना , ध्यान भजन घर पर ही करना
आज्ञा मानी घर पर आये , पक्ष में मोटी-कोरल धाए
नर्मदा तट पर ध्यान लगाए , लालजी महाराज आकर्षाये
सप्रेम शील स्वामी पँह धाए , दत्त-कुटीर में साग्रह लाये
उमडा प्रभु प्रेम का चस्का , अनुष्ठान चालीस दिवस का
मरे छः शत्रु स्थिति पायी , ब्रह्मनिष्ठ्ता सहज समाई
शुभाशुभ सम रोना-गाना , ग्रीष्म ठंड मान और अपमाना
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास , महल और कुटिया आस निरास
भक्ति योग ज्ञान अभ्यासी , हुए समान मगहर और कासी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
भाव ही कारण ईश है , न स्वर्ण काठ पाषाण ।
सत-चित-आनंद रूप है , व्यापक है भगवान ॥
ब्रह्मेशान जनार्दन , सारद शेष गणेश ।
निराकार साकार है , है सर्वत्र भवेश ॥
हुए आसुमल ब्रह्म-अभ्यासी , जन्म अनेको लागे बासी
दूर हो गयी आधि व्याधि , सिद्ध हो गयी सहज समाधि
इक रात नदी तट मन आकर्षा , आई जोर से आंधी वर्षा
बंद मकान बरामदा खाली , बैठे वहीं समाधि लगा ली
देखा किसी ने सोचा डाकू , लाये लाठी भाला चाकू
दौडे चीखे शोर मच गया , टूटी समाधि ध्यान खिंच गया
साधक उठा थे बिखरे केशा , राग द्वेष ना किंचित लेशा
सरल लोगों ने साधू माना , हत्यारों ने काल ही जाना
भैरव देख दुष्ट घबराए , पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाए
कामी जनों ने आशिक माना , साधुजन कीन्हें परनामा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दृष्टि देखे सभी चले शांत गंभीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को सहज गए वे चीर ॥
माता आई धर्म की सेवी , साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी
दोनों फूट-फूट के रोई , रुदन देख करुना भी रोई
संत लालजी हृदय पसीजा , हर दर्शक आंसू में भीजा
कहा सभी ने आप जइयो , आसुमल बोले की भाइयों
चालीस दिवस हुआ नही पूरा , अनुष्ठान है मेरा अधूरा
आसुमल ने छोडी तितिक्षा , माँ पत्नी ने की प्रतीक्षा
जिस दिन गाँव से हुई विदाई जार जार रोए लोग लुगाई
अहमदाबाद को हुए रवाना , मिया-गाँव से किया पयाना
मुम्बई गए गुरु की चाह , मिले वहीं पे लीलाशाह
परम पिता ने पुत्र को देखा , सूर्य ने घट जल में पेखा
घटक तोड़ जल जल में मिलाया , जल प्रकाश आकाश में छाया
निज स्वरूप का ज्ञान द्रढाया , ढाई दिवस होश न आया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्यान्ह ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार ॥
परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया , जीव गया और शिव को पाया
जान लिया हूँ शांत निरंजन , लागू मुझे न कोई बन्धन
यह जगत सारा है नश्वर , मैं ही शाश्वत एक अनश्वर
दीद है दो पर दृष्टि एक है , लघु गुरु में वही एक है
सर्वत्र एक किसे बतलाये , सर्व व्याप्त कहाँ आये जाये
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा , चले उसकी इच्छा अनुसारा
यदि वह संकल्प चलाये , मुर्दा भी जीवित हो जाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य रहे न शेष ।
मोह कभी न ठग सके , इच्छा नहीं लवलेश ॥
पूर्ण गुरु कृपा मिली , पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते , ब्रह्मानंद का आनंद लेते
खाते पीते मौन या कहते , ब्रह्मानंद मस्ती में रहते
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश , गृहस्थ साधु करो उपदेश
किये गुरु ने वारे न्यारे , गुजरात डीसा गाँव पधारे
मृत गाय दिया जीवन दाना , तब से लोगों ने पहचाना
द्वार पे कहते नारायण हरि , लेने जाते कभी मधुकरी
तब से वे सत्संग सुनाते , सभी आरती शांति पाते
जो आया उद्धार कर दिया , भक्त का बेडा पार कर दिया
कितने मरणासन्न जिलाए , व्यसन मांस और मद्य छुडाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दिन मन उकता गया , किया डीसा से कूच ।
आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूँक ॥
वे नारेश्वर धाम पधारे , जा पहुंचे नर्मदा किनारे
मीलों पीछे छोडा मंदिर , गए घोर जंगल के अन्दर
घने वृक्ष तले पत्थर पर , बैठे ध्यान निरंजन का धर
रात गयी प्रभात हो आई बाल रवि ने सूरत दिखाई
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता , छूटा ध्यान उठे तब संता
प्रातर्विधि निवृत हो आये , तब आभास क्षुधा का पाए
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा , यहीं बैठ कर अब खाऊँगा
जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि कर्ता खुद लाएगा
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये , त्यों ही दो किसान वहाँ आये
दोनों सिर पर बांधे साफा , खाद्य पेय लिए दोनों हाथा
बोले जीवन सफल है आज , अर्घ्य स्वीकारो महाराज
बोले संत और पे जाओ जो है तुम्हारा उसे खिलाओ
बोले किसान आपको देखा , स्वप्न में मार्ग रात को देखा
हमारा न कोई संत है दूजा , आओ गाँव करें तुमरी पूजा
आसाराम तब मन में धारे , निराकार आधार हमारे
पिया दूध थोडा फल खाया , नदी किनारे जोगी धाय
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गांधीनगर गुजरात में , है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का , यहीं है पावन धाम ॥
आत्मानंद में मस्त है , करे वेदान्ती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का , सदगुरु करते मेल ॥
साधिकाओं का अलग , आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा , जिसका नहीं बयान ॥
बालक वृद्ध और नर नारी , सभी प्रेरणा पाए भारी
एक बार जो दर्शन पाए , शांति का अनुभव हो जाये
नित्य विविध प्रयोग कराये , नादानुसंधान बताये
नाभि से वे ओम कहलायें , हृदय से वे राम कहलायें
सामान्य ध्यान जो लगाये , उन्हें वे गहरे में ले जायें
सबको निर्भय योग सिखाएं , सबका आत्मोत्थान करायें
हजारों के रोग मिटाए , और लाखों के शोक छुडाये
अमृतमय प्रसाद जब देते , भक्त का रोग शोक हर लेते
जिसने नाम का दान लिया है , गुरु अमृत का पान किया है
उनका योग क्षेम वे रखते , वे न तीन तापों से तपते
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते , आपद रोगों से बच जाते
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं , सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं
सचमुच गुरु हैं दीन दयाल , सहज ही कर देते हैं निहाल
वे चाहते सब झोली भर ले , निज आत्मा का दर्शन कर लें
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे , उनके सारे काज सरेंगे
गंगाराम शील है दासा , होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वराभयदाता सदगुरु , परम ही भक्त कृपाल ।
निश्चल प्रेम से जो भजे , साँई करे निहाल ॥
मन में नाम तेरा रहे , मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये , रहे चरण में प्रीत ॥
गुरु चरण रज शीश धरी , हृदय रूप विचार ।
श्री आसारामायण कहों , वेदान्त को सार ॥
धर्म कामार्थ मोक्ष दे , रोग शोक संहार ।
भजे जो भक्ति भाव से , शीघ्र हो बेडा पार ॥
भारत सिंधु नदी बखानी , नवाब जिले में गाँव बेराणी
रहता एक सेठ गुनखानी , नाम थाउमल सिरुमलानी
आज्ञा में रहती मेंह्गीबा , पति परायण नाम मंगीबा
चैत वद छः उन्नीस अठानवे , आसुमल अवतरित आँगने
माँ मन में उमडा सुख सागर , द्वार पे आया एक सौदागर
लाया एक अति सुन्दर झूला , देख पिता मन हर्ष से फूला
सभी चकित ईश्वर की माया , उचित समय पर कैसे आया
ईश्वर की यह लीला भारी , बालक है कोई चमत्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
संत सेवा और श्रुति श्रवण , मात पिता उपकारी ।
धर्म पुरुष जन्मा कोई , पुण्यों का फल भारी ॥
सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी
समाज में थी मान्यता जैसी , प्रचलित एक कहावत ऐसी
तीन बहन के बाद जो , आता पुत्र वह त्रेखन कहलाता
होता अशुभ अमंगल कारी , दरिद्रता लाता है भारी
विपरीत किन्तु दिया दिखाई , घर में जैसे लक्ष्मी आई
तिरलोकी का आसन डोला , कुबेर ने भण्डार ही खोला
मान प्रतिष्ठा और बढाई , सब के मन सुख शांति छाई
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
तेजोमय बालक बढा , आनंद बढा अपार ।
शील शांति का आत्मधन , करने लगा विस्तार ॥
एक दिना थाउमल द्वारे , कुलगुरु परशुराम पधारे
ज्यूँ ही वे बालक को निहारे , अनायास ही सहसा पुकारे
यह नहीं बालक साधारण , दैवी लक्षण तेज हैं कारण
नेत्रों में है सात्विक लक्षण , इसके कार्य बडे विलक्षण
यह तो महान संत बनेगा , लोगों का उद्धार करेगा
सुनी गुरु की भविष्य वाणी , गद गद हो गए सिरुमलानी
माता ने भी माथा चूमा , हर कोई ले करके घूमा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ज्ञानी वैरागी पूर्व का , तेरे घर में आये ।
जन्म लिया है योगी ने , पुत्र तेरा कहलाये ॥
पावन तेरा कुल हुआ , जननी कोख कृतार्थ ।
नाम अमर तेरा हुआ , पूर्ण चार पुरुषार्थ ॥
सैतालिस में देश विभाजन , पाक में छोडा भू पशु औ धन
भारत अमदाबाद में आये , मणिनगर में शिक्षा पाए
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति , असुमल की आशु युक्ति
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता , त्वरित कार्य और सहनशीलता
आसुमल प्रसन्न मुख रहते , शिक्षक हसमुख भाई कहते
पिस्ता बादाम काजू अखरोट , भरे जेब खाते भर पेटा
दे दे मक्खन मिश्री कूजा , माँ ने सिखाया ध्यान और पूजा
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे , रहे न मछली जल बिन जैसे
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे , वही है विद्या या विमुक्तये
बहुत रात तक पैर दबाते , भरे कंठ पितु आशीष पाते
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पुत्र तुम्हारा जगत में , सदा रहेगा नाम ।
लोगों के तुमसे सदा , पूरन होंगे काम ॥
सिर से हटी पिता की छाया , तब माया ने जाल फैलाया
बडे भाई का हुआ दुसाशन , व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा , शुरू हो गई अग्नि परीक्षा
गए सिद्धपुर नौकरी करने , कृष्ण के आगे बहाए झरने
सेवक सखा भाव से भीजे , गोविन्द माधव तब रीझे
एक दिना एक माई आई , बोली हे भगवन सुखदायी
पड़े पुत्र दुख मुझे झेलने , खून केस दो बेटे जेल में
बोले आसु सुख पावेंगे , निर्दोष छुट जल्दी आवेंगे
बेटे घर आये माँ भागी , आसुमल के पावों लगी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसुमल का पुष्ट हुआ , आलोकिक प्रभाव ।
वाक सिद्धि की शक्ति का , हो गया प्रादुर्भाव ॥
बरस सिद्धपुर तीन बिताये , लौट अहमदाबाद में आये
करने लगी लक्ष्मी नर्तन , किया भाई का दिल परिवर्तन
दरिद्रता को दूर कर दिया , घर वैभव भरपूर कर दिया
सिनेमा उन्हें कभी न भाये , बलात ले गए रोते आये
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया , उसको ही अब रोना आया
माँ करना चाहती थी शादी , आसुमल का मन वैरागी
फिर भी सबने शक्ति लगाई , जबरन कर दी उनकी सगाई
शादी को जब हुआ उनका मन , आसुमल कर गए पलायन
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
पंडित कहा गुरु समर्थ को , रामदास सावधान ।
शादी फेरे फिरते हुए , भागे छुडा कर जान ॥
करत खोज में निकल गया दम , मिले भरुच में अशोक आश्रम
कठिनाई से मिला रास्ता , प्रतिष्ठा का दिया वास्ता
घर में लाये आजमाये गुर , बारात ले पहुंचे आदिपुर
विवाह हुआ पर मन द्रढाया , भगत ने पत्नी को समझाया
अपना व्यवहार होगा ऐसे , जल में कमल रहता है जैसे
सांसारिक व्यवहार तब होगा , जब मुझे साक्षात्कार होगा
साथ रहे ज्यूँ आत्मा काया , साथ रहे वैरागी माया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
अनश्वर हूँ मैं जानता , सत-चित हूँ आनंद ।
स्थिति में जीने लगूँ , होवे परमानन्द ॥
मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु , संस्कृत भाषा है एक सेतु
संस्कृत की शिक्षा पायी , गति और साधना बढाई
एक श्ळोक ह्रदय में पैठा , वैराग्य सोया उठ बैठा
आशा छोड़ नैराश्यवलम्बित , उनकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित
लक्ष्मी देवी को समझाया , ईश प्राप्ति ध्येय बताया
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा , लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा
केदारनाथ के दर्शन पाए , लक्षाधिपति आशीष पाए
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये , ईश प्राप्ति आशीष पाए
आये कृष्ण लीला स्थली में , वृन्दावन की कुञ्ज गलिन में
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला , वे जा पहुंचे नैनिताला
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित , स्वामी लीलाशाह प्रतिष्टित
भीतर तरल थे बाहर कठोरा , निर्विकल्प ज्यूँ कागज़ कोरा
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी , ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ईश-कृपा बिन गुरु नहीं गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहि वेद-पुराण ॥
जानने को साधक की कोटी , सत्तर दिन तक हुई कसौटी
कंचन को अग्नि में तपाया , गुरु ने आसुमल बुलवाया
कहा गृहस्थ हो कर्म करना , ध्यान भजन घर पर ही करना
आज्ञा मानी घर पर आये , पक्ष में मोटी-कोरल धाए
नर्मदा तट पर ध्यान लगाए , लालजी महाराज आकर्षाये
सप्रेम शील स्वामी पँह धाए , दत्त-कुटीर में साग्रह लाये
उमडा प्रभु प्रेम का चस्का , अनुष्ठान चालीस दिवस का
मरे छः शत्रु स्थिति पायी , ब्रह्मनिष्ठ्ता सहज समाई
शुभाशुभ सम रोना-गाना , ग्रीष्म ठंड मान और अपमाना
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास , महल और कुटिया आस निरास
भक्ति योग ज्ञान अभ्यासी , हुए समान मगहर और कासी
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
भाव ही कारण ईश है , न स्वर्ण काठ पाषाण ।
सत-चित-आनंद रूप है , व्यापक है भगवान ॥
ब्रह्मेशान जनार्दन , सारद शेष गणेश ।
निराकार साकार है , है सर्वत्र भवेश ॥
हुए आसुमल ब्रह्म-अभ्यासी , जन्म अनेको लागे बासी
दूर हो गयी आधि व्याधि , सिद्ध हो गयी सहज समाधि
इक रात नदी तट मन आकर्षा , आई जोर से आंधी वर्षा
बंद मकान बरामदा खाली , बैठे वहीं समाधि लगा ली
देखा किसी ने सोचा डाकू , लाये लाठी भाला चाकू
दौडे चीखे शोर मच गया , टूटी समाधि ध्यान खिंच गया
साधक उठा थे बिखरे केशा , राग द्वेष ना किंचित लेशा
सरल लोगों ने साधू माना , हत्यारों ने काल ही जाना
भैरव देख दुष्ट घबराए , पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाए
कामी जनों ने आशिक माना , साधुजन कीन्हें परनामा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दृष्टि देखे सभी चले शांत गंभीर ।
सशस्त्रों की भीड़ को सहज गए वे चीर ॥
माता आई धर्म की सेवी , साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी
दोनों फूट-फूट के रोई , रुदन देख करुना भी रोई
संत लालजी हृदय पसीजा , हर दर्शक आंसू में भीजा
कहा सभी ने आप जइयो , आसुमल बोले की भाइयों
चालीस दिवस हुआ नही पूरा , अनुष्ठान है मेरा अधूरा
आसुमल ने छोडी तितिक्षा , माँ पत्नी ने की प्रतीक्षा
जिस दिन गाँव से हुई विदाई जार जार रोए लोग लुगाई
अहमदाबाद को हुए रवाना , मिया-गाँव से किया पयाना
मुम्बई गए गुरु की चाह , मिले वहीं पे लीलाशाह
परम पिता ने पुत्र को देखा , सूर्य ने घट जल में पेखा
घटक तोड़ जल जल में मिलाया , जल प्रकाश आकाश में छाया
निज स्वरूप का ज्ञान द्रढाया , ढाई दिवस होश न आया
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
आसोज सुद दो दिवस , संवत बीस इक्कीस ।
मध्यान्ह ढाई बजे , मिला ईश से ईश ॥
देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निस्सार ।
हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार ॥
परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया , जीव गया और शिव को पाया
जान लिया हूँ शांत निरंजन , लागू मुझे न कोई बन्धन
यह जगत सारा है नश्वर , मैं ही शाश्वत एक अनश्वर
दीद है दो पर दृष्टि एक है , लघु गुरु में वही एक है
सर्वत्र एक किसे बतलाये , सर्व व्याप्त कहाँ आये जाये
अनंत शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा , चले उसकी इच्छा अनुसारा
यदि वह संकल्प चलाये , मुर्दा भी जीवित हो जाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य रहे न शेष ।
मोह कभी न ठग सके , इच्छा नहीं लवलेश ॥
पूर्ण गुरु कृपा मिली , पूर्ण गुरु का ज्ञान ।
आसुमल से हो गए , साई आसाराम ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते , ब्रह्मानंद का आनंद लेते
खाते पीते मौन या कहते , ब्रह्मानंद मस्ती में रहते
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश , गृहस्थ साधु करो उपदेश
किये गुरु ने वारे न्यारे , गुजरात डीसा गाँव पधारे
मृत गाय दिया जीवन दाना , तब से लोगों ने पहचाना
द्वार पे कहते नारायण हरि , लेने जाते कभी मधुकरी
तब से वे सत्संग सुनाते , सभी आरती शांति पाते
जो आया उद्धार कर दिया , भक्त का बेडा पार कर दिया
कितने मरणासन्न जिलाए , व्यसन मांस और मद्य छुडाये
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
एक दिन मन उकता गया , किया डीसा से कूच ।
आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूँक ॥
वे नारेश्वर धाम पधारे , जा पहुंचे नर्मदा किनारे
मीलों पीछे छोडा मंदिर , गए घोर जंगल के अन्दर
घने वृक्ष तले पत्थर पर , बैठे ध्यान निरंजन का धर
रात गयी प्रभात हो आई बाल रवि ने सूरत दिखाई
प्रातः पक्षी कोयल कूकंता , छूटा ध्यान उठे तब संता
प्रातर्विधि निवृत हो आये , तब आभास क्षुधा का पाए
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा , यहीं बैठ कर अब खाऊँगा
जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि कर्ता खुद लाएगा
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये , त्यों ही दो किसान वहाँ आये
दोनों सिर पर बांधे साफा , खाद्य पेय लिए दोनों हाथा
बोले जीवन सफल है आज , अर्घ्य स्वीकारो महाराज
बोले संत और पे जाओ जो है तुम्हारा उसे खिलाओ
बोले किसान आपको देखा , स्वप्न में मार्ग रात को देखा
हमारा न कोई संत है दूजा , आओ गाँव करें तुमरी पूजा
आसाराम तब मन में धारे , निराकार आधार हमारे
पिया दूध थोडा फल खाया , नदी किनारे जोगी धाय
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
गांधीनगर गुजरात में , है मोटेरा ग्राम ।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का , यहीं है पावन धाम ॥
आत्मानंद में मस्त है , करे वेदान्ती खेल ।
भक्ति योग और ज्ञान का , सदगुरु करते मेल ॥
साधिकाओं का अलग , आश्रम नारी उत्थान ।
नारी शक्ति जागृत सदा , जिसका नहीं बयान ॥
बालक वृद्ध और नर नारी , सभी प्रेरणा पाए भारी
एक बार जो दर्शन पाए , शांति का अनुभव हो जाये
नित्य विविध प्रयोग कराये , नादानुसंधान बताये
नाभि से वे ओम कहलायें , हृदय से वे राम कहलायें
सामान्य ध्यान जो लगाये , उन्हें वे गहरे में ले जायें
सबको निर्भय योग सिखाएं , सबका आत्मोत्थान करायें
हजारों के रोग मिटाए , और लाखों के शोक छुडाये
अमृतमय प्रसाद जब देते , भक्त का रोग शोक हर लेते
जिसने नाम का दान लिया है , गुरु अमृत का पान किया है
उनका योग क्षेम वे रखते , वे न तीन तापों से तपते
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते , आपद रोगों से बच जाते
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं , सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं
सचमुच गुरु हैं दीन दयाल , सहज ही कर देते हैं निहाल
वे चाहते सब झोली भर ले , निज आत्मा का दर्शन कर लें
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे , उनके सारे काज सरेंगे
गंगाराम शील है दासा , होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ
वराभयदाता सदगुरु , परम ही भक्त कृपाल ।
निश्चल प्रेम से जो भजे , साँई करे निहाल ॥
मन में नाम तेरा रहे , मुख पे रहे सुगीत ।
हमको इतना दीजिये , रहे चरण में प्रीत ॥
अगर इस जन्म में प्रभु को जाना नहीं
अगर इस जन्म में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
तेरे सोभाग्य से शुभ समय मिल गया
इसके उपयोग का योग कर न सके
जो समय पर समय को समझा नहीं
व्यर्थ अवसर बिताने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नही
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
तेल साबुन से धोया है मल मल कर तन
प्रयाग काशी अयोध्या गए वृन्दावन
फिर भी निर्मल हुआ न तेरा मन
तेरे गंगा नहाने से क्या फायदा
अगर इस जन्म में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
मीठी वाणी न जानी कभी बोलके
विष भरी बोली है विष घोलके
तेरी बोली में है गोली का असर
तेरे गाने बजाने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
आने जाने का प्रतिफल जितेन्द्रिय यही
आने जाने बंधन से निर्मुक्त हो
आना जाना जग में लगा ही रहा
तेरे गाने बजाने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
तेरे सोभाग्य से शुभ समय मिल गया
इसके उपयोग का योग कर न सके
जो समय पर समय को समझा नहीं
व्यर्थ अवसर बिताने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नही
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
तेल साबुन से धोया है मल मल कर तन
प्रयाग काशी अयोध्या गए वृन्दावन
फिर भी निर्मल हुआ न तेरा मन
तेरे गंगा नहाने से क्या फायदा
अगर इस जन्म में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
मीठी वाणी न जानी कभी बोलके
विष भरी बोली है विष घोलके
तेरी बोली में है गोली का असर
तेरे गाने बजाने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
आने जाने का प्रतिफल जितेन्द्रिय यही
आने जाने बंधन से निर्मुक्त हो
आना जाना जग में लगा ही रहा
तेरे गाने बजाने से क्या फायदा
अगर इस जनम में प्रभु को जाना नहीं
तेरे नर तन पाने से क्या फायदा
जिन्दगी की शर्त अगर पूरी न हो
तो यह जिन्दगी गवाने से क्या फायदा
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू मेरा चाँद वर्गा
एस दी कृपा बड़ी निराली
वेख लें दे मथा टेक लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू सदगुरु बनकर आया मैंने वेख लें दे.रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बूटे बूटे पानी लावे
सूखे बुटे हरे बनावे
नि ओ माली बनकर आया मैनू वेख लें दे
मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
चिट्टा चिट्टा चोला पावे
सिर ते सोणी टोपी लावे
हाथ विच फुल्ला दा हार मैनू वेख लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
नाम दी उसने पयाऊ लगाई
हरी ॐ नाल दुनिया झुमाई
नाम दा अमृत मैंने पीके वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बर्हमज्ञान दी महक पिलावे
जो कोई धयावे ओही तर जावे
बर्हम दा प्रेम स्वरूप मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरु दा चरणी तीरथ तारे
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
आया तारणहारा मैनू वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
जिथे वी ओ चरण छुआवे
पत्थर दिल उतहे पिघल जावे
आया पार उतारन मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरुआ दी महिमा गायी न जावे
तिर्लोकी एत्हे झूम जाये
आया पर उतारन मैंने देख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू मेरा चाँद वर्गा
एस दी कृपा बड़ी निराली
वेख लें दे मथा टेक लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बापू सदगुरु बनकर आया मैंने वेख लें दे.रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बूटे बूटे पानी लावे
सूखे बुटे हरे बनावे
नि ओ माली बनकर आया मैनू वेख लें दे
मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
चिट्टा चिट्टा चोला पावे
सिर ते सोणी टोपी लावे
हाथ विच फुल्ला दा हार मैनू वेख लें दे
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
नाम दी उसने पयाऊ लगाई
हरी ॐ नाल दुनिया झुमाई
नाम दा अमृत मैंने पीके वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
बर्हमज्ञान दी महक पिलावे
जो कोई धयावे ओही तर जावे
बर्हम दा प्रेम स्वरूप मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरु दा चरणी तीरथ तारे
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
आया तारणहारा मैनू वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
जिथे वी ओ चरण छुआवे
पत्थर दिल उतहे पिघल जावे
आया पार उतारन मैंने वेख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
गुरुआ दी महिमा गायी न जावे
तिर्लोकी एत्हे झूम जाये
आया पर उतारन मैंने देख लें दे.
रब मेरा सदगुरु बनके आया मैनू वेख लें दे. मैनू वेख लें दे मथा टेक लें दे.
जोगी रे हम तो लुट गये तेरे प्यार में
जोगी रे हम तो लुट गये तेरे प्यार में
जोगी रे हम तो लुट गये तेरे प्यार में
जाने ना जाने ना तुझको खबर कब होगी
चन्दा भी देखा तारे भी देखे देखा सूरज बरसों
जब से मैंने तुमको देखा मन में फूली सरसों
हाय हाय जोगी रे हम तो लुट गये.......
सूरत तेरी बड़ी है प्यारी अखियाँ हैं मतवाली
नज़र उतारूँ तेरी गुरूवर जाऊँ वारी वारी
हाय हाय जोगी रे..............
तेरा रूप है सबसे न्यारा तू सबका रखवाला
सबको नाच नचावे जोगी कैसा भोला भाला
हाय हाय जोगी रे.............
जब से मैंने तुमको देखा छूट गयी मनमानी
साँस साँस में नाम रटूँ तेरा हो गई मैं दीवानी
हाय हाय जोगी रे............
मेरे दिलबर मेरे रहबर साथ सदा मेरे रहना
दूर न होना हमसे जोगी ऐसा तुमसे कहना
हाय हाय जोगी रे.....
तन मन में बस जाओ जोगी यह है मेरी मर्जी
इसको मेरा भाव समझ लो या समझो खुदगर्जी
हाय हाय जोगी रे......
तुम ही तुम हो मेरे दिल में और कोई न रहता
मेरी साँसों की सरगम में तेरा नाम है रहता
हाय हाय जोगी रे......
तेरे प्रेम में मैं बह जाऊँ मूरत मनवा बसाऊँ
तेरा सुमिरन करके जोगी भव सागर तर जाऊँ
हाय हाय जोगी रे......
जोगी रे हम तो लुट गये तेरे प्यार में
जाने ना जाने ना तुझको खबर कब होगी
चन्दा भी देखा तारे भी देखे देखा सूरज बरसों
जब से मैंने तुमको देखा मन में फूली सरसों
हाय हाय जोगी रे हम तो लुट गये.......
सूरत तेरी बड़ी है प्यारी अखियाँ हैं मतवाली
नज़र उतारूँ तेरी गुरूवर जाऊँ वारी वारी
हाय हाय जोगी रे..............
तेरा रूप है सबसे न्यारा तू सबका रखवाला
सबको नाच नचावे जोगी कैसा भोला भाला
हाय हाय जोगी रे.............
जब से मैंने तुमको देखा छूट गयी मनमानी
साँस साँस में नाम रटूँ तेरा हो गई मैं दीवानी
हाय हाय जोगी रे............
मेरे दिलबर मेरे रहबर साथ सदा मेरे रहना
दूर न होना हमसे जोगी ऐसा तुमसे कहना
हाय हाय जोगी रे.....
तन मन में बस जाओ जोगी यह है मेरी मर्जी
इसको मेरा भाव समझ लो या समझो खुदगर्जी
हाय हाय जोगी रे......
तुम ही तुम हो मेरे दिल में और कोई न रहता
मेरी साँसों की सरगम में तेरा नाम है रहता
हाय हाय जोगी रे......
तेरे प्रेम में मैं बह जाऊँ मूरत मनवा बसाऊँ
तेरा सुमिरन करके जोगी भव सागर तर जाऊँ
हाय हाय जोगी रे......
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